मधुश्रावणी पूजा 2026 – जाने इसके पीछे की सारी कहानी
मधुश्रावणी’ दो शब्दों से बना है—’मधु’ जिसका अर्थ है शहद या मिठास) और ‘श्रावणी’ (यानी सावन का महीना)। यहाँ मधू का अर्थ है शहद या मिठास से और श्रावणी का मतलब सावन महीने से है।
मधुश्रावणी मिथिलांचल पारंपरिक और सुहाग के लिए किया जाने वो एक पूजा या व्रत है। जिसे शादी के पहले साल सावन के महीने में नवविवाहित लड़कियां अपने सुहाग के लंबी उम्र और रिश्तों में मिठास बने रहे इसके लिए करते हैं। जिस तरह करवा चौथ पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है, वैसे ही मिथिला में मधुश्रावणी का महत्व है।
आइए समझते है की ये करवाचौथ , तीज जैसे व्रत से कैसे अलग है । जहां ये सब व्रत सिर्फ एक दिन का होता है वही मधुश्रावणी पूजा 13 से लेकर 15 दिनों तक का होता है । यह कितने दिनों का होगा वो मिथिला पंचाग के तिथि के अनुसार तय होता है। यह सावन के कृष्ण पक्ष की पंचमी से शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलता हैं।
इस बार मधुश्रावणी पूजा की आरंभ तिथि: 3 अगस्त 2026 (सावन की पहली सोमवारी / कृष्ण पक्ष पंचमी)समापन तिथि: 15 अगस्त शुक्ल पक्ष की तृतीया तक होगी , इस बार ये पूरे 13 दिन का पूजा है।

मधुश्रावणी की शुरुआत कैसे हुई?
पौराणिक कथाएं के अनुसार मधुश्रावणी पूजा मुख्य रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और नाग-नागिन/विषहरी की पूजा पर केंद्रित है।
कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। सावन का महीना शिव और माता पार्वती के पुन: पुनः मिलन का प्रतीक है। मधुश्रावणी के दौरान, नवविवाहित कन्या शिव-पार्वती की पूजा करके यह वरदान मांगती हैं , कि उनका दांपत्य जीवन भी शिव और शक्ति की तरह बनी रहे। रोज शाम को जब कथा सुना जाता है जो आमतौर पर कोई बुजुर्ग होती है शिव-पार्वती के विवाह की कथाएं सुनाती हैं।
रोज रोज अलग कथा सुनाया जाता है
- मौन पंचमीक कथा , विषहाराक जन्म
- बिहूला आ मानसाक कथा
- धरतीक जन्म और समुन्द्र मंथन
- सती की कथा
- महादेव के परिवार की कथा
- गंगा की कथा और गौरी का जन्म
- गौरीजी की तपस्या
- गौरीजी की विवाह
- कार्तिक और गणेश जी का जन्म
- सन्ध्याक विवाह और लीली का जन्म और विवाह
- पतिवर्ता सुकन्या का कथा
- बाल बसंत और गोसाउनीक कथा
- श्रीकर राजा के कथा
विषहरी-नाग देवता और मनसा देवी की कथा
मधुश्रावणी की मुख्य देवी मनसा देवी /विषहरी हैं, जो नागों की देवी मानी जाती हैं।
मधुश्रावणी पूजा की संपूर्ण विधि
यह पूजा लड़की अपने मायके में करती है, लेकिन इसमें लगने वाला हर एक सामान चाहे वह पूजा की सामग्री हो, या कपड़े हों, और 15 दिनों तक खाया जाने वाला अन्न सब कुछ ससुराल से आता है। इस दौरान लड़की मायके का पानी तो पी सकती है, लेकिन खाना सिर्फ ससुराल ससुराल से आए अन्न से ही करती है।
भार/उपहार आने परंपरा
15 दिनों तक पूजा मे लगने वाला हर एक सामान ससुराल से आता है, इस सामान को ही ‘भार’ कहा जाता है। ससुराल से सजे-धजे बांस के सूप या डलियों में चूड़ा, दही, आम, मिठाइयां, साड़ी, और श्रृंगार का सामान आता है, तो उसे देखने पूरा गांव आता है।
अरिपन की कला और मिट्टी और गोबर की मूर्तियों का बनाना
‘अरिपन’ चावल के आटे से फर्श पर बनाई जाने वाली रंगोली कला होती है।मिथिला अपनी ‘अरिपन’ कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
चिकनी मिट्टी और गोबर से नाग-नागिन, शिव-पार्वती और अन्य देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां बनाई जाती हैं। इनको पान के पत्तों पर सजाकर पूजा किया जाता है।

फूल लोढ़ना/फूल चुनना
रोज शाम को विवाहित लड़की अपनी सहेलियों और गांव की अन्य महिलाओं के साथ सज-धज कर बगीचों में फूल तोड़ने जाती है। इसे ‘फूल लोढ़ना’ कहते हैं। अगले दिन सुबह इन्हीं ताजे फूलों से भगवान शिव, पार्वती और नाग देवता की पूजा किया जाता है।
टेमी दागने की प्रथा
पूजा के 15वां दिन/अंतिम दिन पति ससुराल से अपनी पत्नी के घर आता है। फिर पती द्वारा ‘टेमी’ पान के पत्ते और रुई की बाती से बना एक छोटा सा दीया होता है। पूजा के अंतिम दिन, पत्नी के घुटनों और पैरों पर सुलगती हुई टेमी/रुई की बत्ती से हल्का सा दागा जाता है। इसे ही टेमी दागने की प्रथा कहते हैं।
मधुश्रवणी का त्योहार किस राज्य में मनाया जाता है?
मधुश्रवणी का त्योहार मुख्य रूप से बिहार के मिथिला के क्षेत्रों में किया जाता है , मिथिला के आलवा भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों मे किया जाता है ।
बिहार में टेमी दगाई क्या है?
मधुश्रावणी पूजा के 15वां दिन/अंतिम दिन पति ससुराल से अपनी पत्नी के घर आता है। फिर पती द्वारा ‘टेमी’ पान के पत्ते और रुई की बाती से बना एक छोटा सा दीया होता है। पूजा के अंतिम दिन, पत्नी के घुटनों और पैरों पर सुलगती हुई टेमी/रुई की बत्ती से हल्का सा दागा जाता है। इसे ही टेमी दागने की प्रथा कहते हैं।
मधुश्रावणी कब है 2026 शुरू होने की तारीख और खत्म होने की तारीख?
इस बार मधुश्रावणी पूजा की आरंभ तिथि: 3 अगस्त 2026 (सावन की पहली सोमवारी / कृष्ण पक्ष पंचमी) और समापन तिथि: 15 अगस्त 2026 (टेमी दागने की रस्म के साथ) पूरी अवधि: 13 दिन
मधुश्रावणी में व्रत रखने वाली नवविवाहिता पूरे 15 दिन निर्जला रहती है?
यह व्रत पूरी तरह से निर्जला नहीं होता है। नवविवाहिताएं दिन में पूजा संपन्न होने तक उपवास रखती हैं और पूजा के बाद बिना नमक का शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं। इसमे सेंधा नमक भी नहीं खाया जाता है ।
अंत में, अगर में मैं कहु की मधुश्रावणी पूजा व्रत सिर्फ शिव-पार्वती और नाग देवताओं की पूजा नहीं है। यह एक नई दुल्हन के जीवन का सबसे खूबसूरत शुरुवात होती हैं।
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