मिथिला /मधुबनी पेंटिंग क्या है? इसका इतिहास, विशेषताएं और महत्व -Madhubani Painting 🎨
मिथिला पेंटिंग जीसे मधुबनी चित्रकला के नाम से भी जाना जाता हैं । बिहार के उत्तरी हिस्से और नेपाल के कुछ इलाकों को मिलाकर बने क्षेत्र को ‘मिथिलांचल’ कहा जाता है। मधुबनी इसी क्षेत्र का एक प्रमुख जिला है, जो इस चित्रकला का मुख्य केंद्र रहा है। इस वजह से भी इसका नाम मधुबनी पेंटिंग हैं ।
इस चित्रकला में मुख्यतः महिलाओं द्वारा बनाई जाती है और इसमें प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। प्रारम्भ में यह अरिपन कला के जैसे ही रंगोली के रूप में रहने के बाद यह कला धीरे-धीरे कपड़ो, दीवारों एवं कागज पर उतर आई।
मिथिला चित्रकला का इतिहास क्या है?
मधुबनी पेंटिंग का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि हमारी सांस्कृतिक मान्यताएं। इसकी शुरुआत की कहानी रामायण काल से ही माना जाता हैं ।
राजा जनक और सीता-राम विवाह की पौराणिक कथा
मान्यताओं के अनुसार, मधुबनी पेंटिंग की शुरुआत त्रेता युग में हुई थी। जब राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह श्रीराम के साथ तय किये , तो वे पूरे जनकपुर को एक दुल्हन की तरह सजाना चाहते थे। राजा जनक ने अपने राज्य के सभी ग्रामीणों और कलाकारों को आदेश दिया कि वे अपने घरों की दीवारों और फर्श पर भगवान श्री राम और माता सीता के विवाह के पलों को चित्रों के रूप में बनाए। बस, तब से ही चित्रकला की शुरुवात माना जाता है ।
सदियों तक यह कला मिथिला के गांवों की दीवारों तक ही सीमित रही। मिथिला के बाहर की दुनिया को इसके बारे में कोई खबर नहीं थी। कहा जाता है की 1934 में आए एक भयानक भूकंप ने इस कला को दुनिया के नज़रों मे ला खड़ा कर दिया।
1934 में बिहार में एक विनाशकारी भूकंप आया, जिससे मिथिला सहित पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया। उस समय मधुबनी जिले के ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू.जी. आर्चर (W.G. Archer) नुकसान का जायजा लेने इन क्षेत्रों में पहुंचे थे । जब आर्चर टूटे हुए घरों का मुआयना कर रहे थे, उनकी नजर ढही हुई दीवारों पर बने चित्रो देखकर वे दंग रह गए।
विलियम जी. आर्चर ने इन चित्रों के ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफ्स लिए और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में लेख लिखे। इस तरह यह चित्रकला पहली बार वैश्विक मंच पर आ खड़ी हुई। जहां से इसे एक नई पहचान मिली , कल तक जो एक छोटे से क्षेत्र में था आज उसको पूरी दुनिया जानने लगी ।

मधुबनी पेंटिंग की प्रमुख शैलियां
इसमें पांच मुख्य शैलियां है –
भरनी शैली- ‘भरनी’ का अर्थ होता है भरना। इस शैली में रेखाएं खींचने के बाद चित्र के अंदर प्राकृतिक रंगों जैसे लाल, पीला, नारंगी, नीला आदि से भर दिया जाता है। पारंपरिक रूप से इसमें मुख्य रूप से देवी-देवताओं की आकृतियां बनाई जाती हैं।
कचनी शैली- ‘कचनी’ का मतलब होता है काटना या बारीक रेखाएं बनाना। इस शैली की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसमें चित्रों को भरने के लिए रंगों का नहीं, बल्कि केवल काली या लाल स्याही से बनाई गई महीन रेखाओं का उपयोग होता हैं ।
तांत्रिक शैली- यह शैली पूरी तरह से धार्मिक होती है। इसमें तंत्र साधना से जुड़े प्रतीक, जैसे महाकाली, यन्त्र और रहस्यमयी आकृतियां बनाई जाती हैं।
गोदना शैली- यह टैटू आर्ट पर आधारित है। इसमें बांस की कलम और काली स्याही से छोटे-छोटे चक्र, वृत्त और कई तरह पैटर्न बार-बार बनाए जाते हैं।
गोबर शैली- इसमें कागज या कपड़े को गोबर और मिट्टी के घोल से लीपा जाता है, जिससे पृष्ठभूमि को एक प्राकृतिक दिखता हैं । और फिर उस पर सफेद व अन्य रंगों से आकृतियां बनाई जाती हैं।
इनके अलावा , इस चित्रकला का सबसे पसंदीदा विषय हिंदू धर्म ग्रंथ और कथाएं हैं। भगवान कृष्ण की रासलीला, राम-सीता का विवाह, शिव-पार्वती का संवाद, और दुर्गा माँ के उग्र रूप इस कला का मुख्य केंद्र बिंदु हैं। चित्रों में पात्रों की आंखें हमेशा बड़ी-बड़ी और आकृतियां 2D बनाई जाती हैं, जो की देखने में उन्हे एक अलग ही रूप देता है ।





मिथिला पेंटिंग में प्रतीकों का अर्थ
अगर आप मधुबनी पेंटिंग को ध्यान से देखेंगे, तो इसमे आपको देवी-देवताओं के अलावा ढेर सारे जीव-जंतु और पेड़-पौधे भी नजर आएंगे। इनका एक विशेष मतलब होता है:
- मछली (Fish): अच्छी किस्मत, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक होता हैं।
- मोर (Peacock): प्रेम, शांति और रोमांस का प्रतीक होता हैं।
- सूर्य (Sun): ऊर्जा, जीवन और लंबी उम्र का प्रतीक होता हैं।
- बांस (Bamboo): वंश वृद्धि और निरंतरता का प्रतीक होता हैं।
मधुबनी पेंटिंग कैसे बनाई जाती है
मधुबनी पेंटिंग की आत्मा उसकी निर्माण प्रक्रिया में बसती है। पारंपरिक कलाकार आज भी बाजार के केमिकल रंगों के बजाय खुद अपने रंग बनाते हैं:
- काला रंग: काजल और सरसों के तेल की कालिख या जली हुई बांस की पत्तियों से।
- पीला रंग: हल्दी, चूना और दूध के मिश्रण से या पारिजात /हरसिंगार के फूलों के रस से।
- लाल रंग: कुसुम के फूलों के रस या लाल चंदन से।
- हरा रंग: सेम के पत्तों के रस या बेलपत्र के अर्क से।
- सफेद रंग: पिसे हुए चावल के घोल -अरिपन से।
- नीला रंग: असली नील से।
इन रंगों को टिकाऊ बनाने के लिए इनमें बबूल का गोंद मिलाया जाता है।
मधुबनी चित्रकला से जुड़े कुछ तथ्य
- जापान के निगाता (Niigata) शहर में एक विशेष ‘मिथिला म्यूजियम’ बनाया गया है, जहाँ हजारों दुर्लभ और खूबसूरत मिथिला पेंटिंग्स को सहेज कर रखा गया है।
- बिहार के मधुबनी रेलवे स्टेशन की दीवारों को स्थानीय महिला कलाकारों ने पूरी तरह से मधुबनी पेंटिंग से सजाया है
- इस पेंटिंग की खासियत है कि चित्र बनाने के बाद कैनवास या दीवार पर कोई भी स्थान खाली नहीं छोड़ा जाता। खाली जगहों को फूलों, पत्तियों, पक्षियों और ज्यामितीय आकृतियों से भर दिया जाता है।
- मधुबनी मिथिला चित्रकला को वर्ष 2007 में GI Tag (भौगोलिक संकेत -Geographical Indication) दिया गया था।
मधुबनी चित्रकला से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मधुबनी पेंटिंग में क्या खास है?
मधुबनी पेंटिंग को ध्यान से देखेंगे, तो आपको उसमें देवी-देवताओं के अलावा ढेर सारे जीव-जंतु और पेड़-पौधे भी नजर आएंगे। इनका एक विशेष सामाजिक और प्राकृतिक अर्थ होता है:
मछली (Fish): अच्छी किस्मत, उर्वरता (fertility) और समृद्धि का प्रतीक।
मोर (Peacock): प्रेम, शांति और रोमांस का प्रतीक।
सूर्य (Sun): ऊर्जा, जीवन और दीर्घायु का प्रतीक।
बांस (Bamboo): वंश वृद्धि और निरंतरता का प्रतीक।
मधुबनी पेंटिंग की सबसे मुख्य विशेषता क्या है?
इसकी सबसे मुख्य विशेषता यह है कि इसमें कोई भी जगह खाली नहीं छोड़ी जाती। मुख्य आकृतियों को बनाने के बाद बची हुई खाली जगह को फूलों, पत्तियों, पक्षियों और ज्यामितीय पैटर्न से भर दिया जाता है। इसके अलावा इसमें केवल प्राकृतिक रंगों और दो-आयामी-2D आकृतियों का उपयोग होता है।
‘कोहबर’ पेंटिंग क्या होती है?
‘कोहबर’ मिथिला में शादी के समय नवदंपति के कमरे की दीवार पर बनाई जाने वाली एक विशेष मधुबनी पेंटिंग होती है। इसमें कामदेव, रति, बांस, मछली, मयूर और लोटस जैसे प्रतीकों का चित्र बनाया जाता हैं , जो प्रेम, कामवासना, उर्वरता और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद देने के लिए बनाए जाते हैं।
मधुबनी पेंटिंग कैसे बनाएं?
मधुबनी पेंटिंग बनाने के लिए किसी महंगे ब्रश या पेंटशेड की जरूरत नहीं पड़ती? पारंपरिक रूप से, महिलाएं अपनी अंगुलियों, बांस की तीलियों में रुई लपेटकर, या फिर माचिस की तीलियों और निब वाले पेन का इस्तेमाल करके ये चित्र बनाती हैं।
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