बाबा कुशेश्वरनाथ की पावन नगरी- कुशेश्वरस्थान मंदिर, दरभंगा

कुशेश्वरस्थान मंदिर भगवान शिव के बहुत ही प्राचीन और सिद्ध स्वरूप बाबा कुशेश्वरनाथ को समर्पित एक धाम है। यह मंदिर बिहार के दरभंगा जिले के पूर्वी छोर पर कुशेश्वरस्थान ब्लॉक में स्थित है। यह मंदिर चारों तरफ से कोसी, कमला, बलान जैसी नदियों और विशाल जलमग्न क्षेत्र से घिरा हुआ हैं।

बाबा कुशेश्वरनाथ को मिथिला का बैद्यनाथधाम भी कहा जाता है। भक्तों का मानना है कि यहाँ मनोकामनाएँ जरूर पूरी होती हैं।

कुशेश्वरस्थान मंदिर

कुशेश्वरस्थान मंदिर का इतिहास

कुशेश्वर स्थान मंदिर का इतिहास रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों से जुड़ते हैं

रामायण काल में भगवान श्रीराम के पुत्र ‘कुश’ की तपो-भूमि

मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान श्री राम के बड़े पुत्र कुश ने इस स्थान को अपनी तपस्या के लिए चुना था। यहाँ पर उन्होंने कठिन तप किया और एक भव्य शिवलिंग की स्थापना की। कुश द्वारा स्थापित और पूजित होने के कारण ही इस धाम का नाम ‘कुशेश्वरनाथ’ और इस क्षेत्र का नाम ‘कुशेश्वर स्थान’ पड़ा।

महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास की मान्यताए

माना जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय मिथिला के इस घने और सुरक्षित जलमग्न वन में समय बिताया था। यहाँ रहने के दौरान धर्मराज युधिष्ठिर और उनके भाइयों ने भगवान शिव के इस स्वरूप की आराधना और पूजा किया था।

शिवलिंग के प्रकट होने की लोककथा

एक और मान्यता के अनुसार यहां कुश का घना जंगल था। इसके साक्ष्य अभी तक यहां दिखाई पड़ते हैं। इस कुश के जंगल में आस पास के गांववाले गाय चराने आते थे। उन्हीं गायों में से एक गाय का बच्चा प्रतिदिन एक ही स्थान पर आकर अपना दूध गिराकर चली जाती थी। जब गावं के लोगों ध्यान इस गाय पर पड़ा तो यह बात पूरे क्षेत्र मे आग के तरह फैल गई । गावं के एक चरवाहा खगा हजारी नाम का था जो संत प्रवृत्ति का था, उसने गाय के द्वारा दिए जाने वाले दूध के स्थान पर खुदाई की तो शिवलिंग मिला। बाद में भगवान शिव ने खगा हजारी को स्वप्न दिया कि यहां मंदिर बना कर पूजा पाठ चालू करे।

मंदिर का निर्माण और विकास

  • सबसे पहले खगा हजारी ने उस स्थान पर फूस के मंदिर बनाकर पूजा पाठ शुरू किया।
  • 18वीं शताब्दी में नरहन सकरपुरा ड्योढ़ी की रानी कमलावती (या कलावती) ने यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इससे पहले फूस का ही छोटा सा मंदिर था। रानी के योगदान ने इस इस जगह को मंदिर के रूप मिल।
  • 1970 के दशक में कोलकाता के बिड़ला ट्रस्ट ने बाबा के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
  • 1990 के दशक में स्थानीय नवयुवक संघ ने देखभाल संभाली और फिर 2016 से न्यास समिति के अधीन मंदिर सुचारू रूप से चल रहा है।

बाबा कुशेश्वरनाथ की महिमा और चमत्कार

दूध कभी खराब नहीं होता – एक अद्भुत मान्यता

माना जाता है की यहाँ बाबा को दूध चढ़ाने वाले व्यक्ति कितनी भी देर से क्यों न पहुँचें, दूध कभी खट्टा नहीं होता। यह चमत्कार आज भी भक्तों को हैरान कर देता है। यह सिर्फ विश्वास है या सच में कोई दिव्य शक्ति काम कर रही है? आप खुद आकर अनुभव कर सकते हैं।

चंद्रकूप की पावन जलधारा

मंदिर परिसर में पवित्र चंद्रकूप नाम का कुआँ है। भक्त यहाँ का जल लेकर घर जाते हैं और मानते हैं कि इससे रोग दूर होते हैं और घर में सुख-शांति आती है।

कुशेश्वर स्थान मंदिर कैसे पहुँचें?

सड़क मार्ग सबसे आसान है। दरभंगा से बस या ऑटो लेकर आसानी से पहुँच सकते हैं। दरभंगा बस स्टैंड से कुशेश्वर स्थान के लिए हर 20 मिनट पर बस मिल जाती हैं। पटना से निजी वाहन या बस से 3-4 घंटे लगते हैं। अगर आप रैलवे से जाना चाहते है तो निकटतम रेलवे स्टेशन हसनपुर रोड -लगभग 20 किमी या बिरौल है।

कुशेश्वर स्थान मंदिर Location

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कुशेश्वर स्थान मंदिर किस जिले में है?

यह मंदिर बिहार के दरभंगा जिले के पूर्वी छोर पर शहर से लगभग 60-65 km दूर कुशेश्वरस्थान ब्लॉक में स्थित है। यह मंदिर चारों तरफ से कोसी, कमला, बलान जैसी नदियों और विशाल जलमग्न क्षेत्र से घिरा हुआ हैं।

इस मंदिर का नाम ‘कुशेश्वर स्थान’ क्यों पड़ा?

मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री राम के पुत्र ‘कुश’ ने इस स्थान पर कठिन तपस्या की थी और इस शिवलिंग की स्थापना की थी। ‘कुश’ द्वारा स्थापना और पूजा करने के कारण ही इस मंदिर और स्थान का नाम कुशेश्वर स्थान पड़ा।

कुशेश्वर स्थान मंदिर के पास कौन सा पक्षी अभयारण्य भी है?

मंदिर के ठीक पास ही कुशेश्वरस्थान पक्षी अभयारण्य/कुशेश्वरस्थान झील  -Bird Sanctuary स्थित है। सर्दियों के मौसम में यहाँ साइबेरिया और अन्य ठंडे देशों से लाखों प्रवासी पक्षी आते हैं।


कुशेश्वर अस्थान मंदिर का इतिहास क्या है?

कुशेश्वर स्थान मंदिर का इतिहास रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों से जुड़ते हैं- 1. रामायण काल में भगवान श्रीराम के पुत्र ‘कुश’ की तपो-भूमि, 2. महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास की मान्यताए के रूप में , 3.एक मान्यता के अनुसार खगा हजारी नाम का चरवाहा को यह शिवलिंग इस जगह पर मिल था ।

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि mithilaworld.in किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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