मिथिलांचल के प्रसिद्ध लोकदेवता और ग्रामदेवताओं की संपूर्ण जानकारी
मिथिलांचल की संस्कृति जितना प्राचीन है, उतना ही समृद्ध यहाँ की लोक-परंपराएं भी हैं। जब भी हम अपनी ऐतिहासिक धरोहर की बात करते हैं, तो हमारे लोकदेवताओं का जिक्र आना स्वाभाविक है। ये वे देवता हैं जो सदियों से हमारे गांवों, खेतों, खलिहानों और परिवारों की रक्षा करते आए हैं और हर एक शुभ कार्य से पहले इनकी पूजा की जाती हैं । आज के इस लेख में हम मिथिला के कुछ प्रमुख लोकदेवताओं के इतिहास, उनकी कथाओं और मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।
लोकदेवता राजा सलहेस
राजा सलहेश का जन्म मधुबनी जिले से सटे नेपाल के सिरहा जिले के महिसौथा नामक स्थान पर 5वीं या 6वीं शताब्दी हुआ था। उनके पिता का नाम सोमदेव और माँ का नाम शुभ गौरी था। विराट नगर के राजा श्री हलेश्वर की पुत्री सत्यवती से राजा सलहेश का विवाह हुआ था।
श्री सलहेश को पहले जयवर्धन के नाम से जाना जाता था लेकिन बाद में राज्याभिषेक के समय सर्वसम्मति से उनका नाम श्री जयवर्धन से बदलकर शैलेश कर दिया गया। शैलेश’ शब्द का अर्थ ‘पर्वतों का राजा’ होता है, जो स्थानीय भाषा में बदलकर ‘सलहेस’ बन गया।
राजा सलहेश को मुख्य रूप से दुसाध (पासवान) समुदाय द्वारा वीरता, पराक्रमी और न्यायप्रिय देवता के रूप में पूजा जाता आया है। कहा जाता है की उन्होंने बार-बार चीन और भूटान के आक्रमणों से मिथिला का रक्षा किया था । उस समय उनके एक महान प्रतिद्वंद्वी वीर चौहरमल थे, जो की एक बहुत महान योद्धा थे।
राजा सलहेश अपने पराक्रम, साहस और विशिष्ट व्यक्तित्व के कारण मिथिला के तत्कालीन राजा बने और अपने कार्यकाल में कई कल्याणकारी काम किए थे । अपने कर्म और तप के बल पर उन्होंने देवत्व को प्राप्त कर लिया और लोग उन्हे देवता मानने लगे, तब से लेकर आजतक मिथिला के घर-घर में बड़े भक्ति- भाव से उनका पूजन होने लगा।
लोकदेवता दिना भदरी
मान्यताओ के अनुसार दीना और भद्री का जन्म नेपाल के सप्तरी जिले के जोगिया गांव में हुआ था । उनके पिता का नाम कालु सदा और और माँ नीरासो थी। दीना सबसे बड़े और भद्री सबसे छोटे थे। बचपन से ही दोनों भाई वीर एवं साहसी थे तथा दोनों भाई कुश्ती में भी अच्छे थे।
दोनों भाई सामंतवाद के कट्टर विरोधी थे। जोगिया नगर के राजा कनक सिंह धामी अत्याचारी और निरंकुश राजा था और उसने राज्य में रहने वाले मुसहरों सहित अन्य उपेक्षित और उत्पीड़ित लोगों को काम करने के लिए मजबूर किया करता था। जो काम करने से माना करता उसका राजा द्वारा शोषण और दमन किया जाता था।माना जाता है की राज का विरोध के चलते षड्यंत्र करके इन दोनों भाइयों को मार दिया गया था ।
लोकदेवता दीना भद्री की कहानी मिथिला के सीमांत क्षेत्र में मुसहर या सदा जाति के दो भाइयों के संघर्ष की कहानी के रूप में प्रसिद्ध है। दीना भद्री एक दलित नायक की कहानी है, जिसने श्रम और संघर्ष के माध्यम से समाज में हो रहे अत्याचार और शोषण को समाप्त करने के लिए अपनी जान गंवा दिए थे।
लोकदेवता भुईया बाबा
भुइया बाबा के पूजा में मुख्य रूप से तीन लोग बाबा बसावन, बाबा बख्तोर और मां गाहिल का पूजा होता हैं!
बाबा बसावन वैशाली जिले के लंगा बसौली/पानापुर लंगा गाँव के निवासी थे। इनका वास्तविक नाम बसावन खिरहर था।
बाबा बख्तौर तिरहुत के उत्तरी भाग गढ़िया रसलपुर के थे। इनका वास्तविक नाम आंसिक बख्तौर था। इनके पिता का नाम पुरन राउत और माता का नाम कोईला था। बाबा बसावन और बाबा बख्तौर दोनों मित्र थे।
उस समय नारी महथि डेहुरी दरबार के राजा दलेल सिंह समय के राजा दलेल सिंह थे जो अत्यंत क्रूर और निर्दयी थे जो लोगों पर अत्याचार किया करते थे। माना जाता है की राजा दलेल सिंह ने मुसहर जाति के एक लाख लोगों को मारने का फैसला किया था।
तब बाबा भुइयां ने राजा दलेल सिंह से पूरे समाज की रक्षा की थी और दलेल सिंह के विरुद्ध युद्ध कर 52 कोस के गोरिया जंगल पर विजय प्राप्त किया और समाज को राजा दलेल सिंह के अत्याचार से मुक्त कराया।
लोककथाओं के अनुसार, मामा बदल सिंह ने अपनी कुलदेवी की पूजा के लिए बहुत बड़ा अनुष्ठान किया था, लेकिन अपनी बहन माता कोईला को निमंत्रण नहीं दिया था। जब बाबा बख्तौर बोरिया वन में भैंस चरा रहे थे, तो उन्हें मानर की आवाज सुनाई दिया जो की एक वादःय यंत्र होता है। ये सुन वे बिना निमंत्रण के ननिहाल चले गये। ननिहाल में उनका अपमान हुआ इससे क्रोधित होकर उन्होंने पूजा भंग कर दी।
इसके बाद मामा बदल सिंह और राजा दलेल सिंह मिलकर ने तांत्रिको के शक्ति से शेला बाघ और लुलिया बाघिन को भेजा उनपे पर हमला करने के लिए । बाबा बख्तौर जिनमें सात भैंसों की ताकत बताई जाती है, उनका बाघों से युद्ध हुआ और वे वीरगति को प्राप्त हुए। इस बलिदान और समाज सेवा के कारण भुईया बाबा लोक देवता के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे गौ-रक्षक और पशुपालक के रक्षक के रूप में जाने जाते हैं।
लोकदेवता बिहुला विषहरी
लोककथाओं के अनुसार, अंग प्रदेश की राजधानी चंपा नगरी भागलपुर में बिहुला विषहरी पूजा का उद्गम स्थल माना जाता है। यहां माता विषहरी को सती बिहुला के कारण प्रसिद्धि मिली थी। भगवान शिव की दत्तक पुत्री विषहरी भगवान शिव की तरह प्रसिद्ध होना चाहती थीं। उन्होंने भगवान शिव से इसके लिए अपनी इच्छा जाहीर किया तो भगवान शिव ने कहा, अंग प्रदेश में मेरा एक भक्त चांदो सौदागर है यदि वह भक्तिपूर्वक आपकी पूजा करेगा तो उससे आपको प्रसिद्धि जरूर मिलेगा।
जब विषहरी माता ने चंदो सौदागर से अपनी इच्छा व्यक्त की तो चंदो सौदागर ने कहा कि वह शिव भक्त हैं और उनकी पूजा करने से मना कर दिया । इससे माता विषहरी नाराज हो गईं और इस कारण चांदो सौदागर के छह बेटे मारे गए। सातवें और आखिरी बेटे बाला का विवाह सती बिहुला से हुआ। अपने वंश के आखिरी बेटे को बचाने के लिए चंदो सौदागर ने भगवान विश्वकर्मा का आह्वान किया और उनसे मदद मांगी।
बाला को जीवित रखने के लिए भगवान विश्वकर्मा ने एक लोहे का बांस रूपी घर बनाया, जिससे सांप कहीं से भी इस घर के अंदर न जा सकें, यह घर आज भी चंपानेर में मौजूद है। कहा जाता है फिर माँ विषहरी ने विश्वकर्मा को चेतावनी दी कि उन्हें घर में एक बाल के बराबर एक छेद छोड़ना होगा अन्यथा परिणाम अच्छा नहीं होगा। भगवान विश्वकर्मा ने माता विषहरी की बात मान ली।
बिहुला के सुहागरात को 12 बजे विषहरि नागदूत को भेज जिसने लखेंद्र को डस लिया , जिससे उसकी मौत हो गई। बिहुला सती थी, वह हार नहीं मानी बिहुला चंपा नदी के जलमार्ग से मंजूषा नाव पर सवार होकर स्वर्ग जाती हैं और अपने पति लखेंद्र को जीवित वापस ले आती हैं।
इसके बाद देवराज इंद्र माँ विषहरि से अनुरोध करते हैं की सती बिहुला के महत्व को समझे । फिर माता विषहरी ने सती बिहुला वही बात दोहराती है जो चंदो ने व्यापारी से कही थी। फिरचंदो सौदागर ने कहा कि वह अपने दाहिने हाथ से भगवान शिव और अपने बाएं हाथ से माता विषहरी की पूजा करेंगे। इसके बाद से यह पूजा चालू हो गया जीसे बिहुला विषहरी कहा जाता हैं।
कुलदेवता वीरभद्र अर्थात सोखा बाबा
कुलदेवता सोखा बाबा की पूजा घर के एक कोने में निश्चित स्थान पर किया जाता हैं । मान्यता है कि वीरभद्र अपने भक्तों के कष्टों और खत्म कर देते है इसलिए उन्हें सोखा बाबा के नाम से जाना जाता है। मिथिला में सोखा का मतलब होता है किसी चीज का खत्म होना। जैसे ” जमीन पानी सोइख लेलक’ अर्थात पानी को जमीन द्वारा अपने अंदर समाहित करके खत्म कर देना । इसी तरह कुल देवता वीरभद्र भी भक्तों के दुख तकलीफ को हर लेते है जिससे उन्हे सोखा बाबा के नाम से जाना जाता हैं।
वीरभद्र (सोखा बाबा) उत्पति के पौराणिक कहानी

सोखा बाबा का उल्लेख 80 के दशक में लोधास निवासी पंडित रामस्वरूप तिवारी द्वारा रचित ‘सोखा चालीसा‘ में मिलता है। इसमें पौराणिक साक्ष्यों के साथ चालीसा के चौपाईयों में श्री वीरभद्र की उत्पत्ति का चर्चा किया गया है।
लिंग पुराण के अनुसार जब माता सती अपने पिताजी के यज्ञ आहुति में कूद जाती है तब भगवान शिव गुस्से से तांडव करने लगते है तांडव करते समय उनके जटा से एक बाल टूट कर नीचे गिरता है जो वीरभद्र के रूप में अवतरीत होते है , और फिर वो महदेव के आज्ञा अनुसार उस यज्ञ स्थल को विध्वंस कर देते है।
बक्सर जिले के लोधास गांव स्थित सोखा बाबा का मंदिर और माँसती कुंड इस बात का प्रमाण है। यह कुंड आज भी तालाब के रूप में है जिसके तट पर माता सत्ती यानी मां दुर्गा का मंदिर है।
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